गुरुवार, 25 सितंबर 2025

भारत साहित्य

मेरे जितने भी अपने थे दूर हमसे हो गए

मेरे जितने भी अपने थे दूर हमसे हो गए
चांद को चाहने वाले भी, सूरज के हो गए

वीरान कर गई बाजार की रौनके उनको
पश्चिम को जाने वाले थे , पूरव के हो गए

कवि दीपक सरल

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