मेरे जितने भी अपने थे दूर हमसे हो गए

मेरे जितने भी अपने थे दूर हमसे हो गए
चांद को चाहने वाले भी, सूरज के हो गए
वीरान कर गई बाजार की रौनके उनको
पश्चिम को जाने वाले थे , पूरव के हो गए
कवि दीपक सरल
एक बच्चा जो अपनी माँ से बिछड़ कर कहीं बाहर रह राहा है और वह माँ को याद करते हुए एक कविता इस प्रकार लिखता है और अपना प्यार माँ के प्रति व्यक्...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें