गुरुवार, 19 मार्च 2026

मां



एक बच्चा जो अपनी माँ से बिछड़ कर कहीं बाहर रह राहा है और वह माँ को याद करते हुए एक कविता इस प्रकार लिखता है और अपना प्यार माँ के प्रति व्यक्त करता है…………….मेरी कलम से


✍कवि दीपक सरल


माँ एक बार मेरे पास आ जा ना माँ,

अपने हाथ से रोटी खिला जा ना माँ ,


दुनिया में कोई अपना नहीं ये बता जा

सर अपनी गोद में रखकर सुला जा ना !


तू फुक मार के मेरी चोट को ठीक कर

मुझे बुखार तो नहीं ये बता जा ना माँ ,


मतलब की दुनिया से ऊब गया हूँ मैं..

एक बार सीने से लगा जा ना माँ…. !


मेरा जन्म दिन भी अभी आने वाला है..

मुझे अपने हाथ से केक खिला जा ना..,


मैं बहुत मेहनत कर रहा हूं……………

माँ के साथ दुनिया घूमनी है ना ……..!


अभी मेरे दिन अच्छे आने वाले है……

मेरे साथ तू खुशियों बना जा ना माँ….,


मैं तुझे बहुत प्यार करता हूं ना माँ……

तू मुझे कभी छोड़ कर मत जाना माँ… !


मेरे साथ बैठ, कई लम्हे गुजर जाने दे…

तू अपनी ख़्वाइस मुझे बता न माँ…….,


मेरे लिए तूने बहुत कुछ किया है…….

जरा अब तो तू खुशियां बना न माँ……!


तू खुस है तो मेरी दुनिया खुस लगती है.

तेरे बिना ये मेला बिरान है माँ ……….,


मैने रोटी खाई या नहीं तू ही पूछती है माँ

तेरी उमर हमें बड़ा करने में निकल गई..!


थोड़ी अपनी भी फिकर करा कर माँ….

मुझे तू दुनिया मैं हारने से बचा ना माँ…,


तेरा हाथ जब तक मेरे हाथ में है……..

डर नहीं मुझे कौन कौन खिलाफ मैं है.!


बस में आए दुनिया जीत लाउ तेरे लिए..

अपना आशीर्वाद सर पर थमा न माँ….. ,


माँ तू कहती है मैं अभी बच्चा हूं……….

ये दुनिया मुझ पर तरस नहीं खाती है….,


मुझे हर मंजिल पे बार बार गिराती है…

ऐसा नहीं करते तू ये बता ना माँ………!


मेरे जेब में पैसे नहीं,पापा से दिला ना माँ.

याद है मुझे साइकिल भी दिलानी है….. ,


मुझे बहुत सारे खिलौने भी लेने हैं अभी.

पापा से सिफारिश लगवा दे ना माँ…… !


कोई रिस्तेदार आए तो पैसे देकर जाए.

बेटा बहुत अच्छा है उन्हें ये तू बताना माँ.,


ये दुनिया मुझमें बहुत ऐब निकलती है…

मैं कैसा हूं दुनिया को ये बता ना माँ …..!


तेरे लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है.

तेरे लिए कई रोतो से लड़ना बाकी है….,


अभी मंजिल हमारी बीच में है………….

अभी सपना पूरा करना बाकी है मां……!


तू चिंता मत कर मैं सब संभाल लूंगा…..

सब परिस्थियों के मुताबिक ढाल लुंगा…,


तू भरोसा रखना मुझ पर मैं हूँ ना माँ..

मैं रातों से सबेरा निकाल लुंगा माँ ….!


दिल से जुड़ा रिश्ता कोई नहीं है…….

तेरे सिवा तेरे जैसा कोई नहीं है…….,

तू मेरे साथ बैठ ना इक दिन…………

मैं तुझको सारा हिसाब दूंगा माँ………!


मेरी पसंद नापसंद कोई ओर क्या जाने.

मेरे खाने की तलब मिटा जा ना माँ……,


हजारो रुपये होटल पर गवा कर देखे हैं.

तेरे जैसा स्वाद कहा आता है माँ…….. !


खुशियों के लिए कितनों से लोहा लिया है

उलझे मुकद्दर को कितनी बार सिया है…,


हमारे खातिर सुबह सुबह जग जाती है… सुबह होते ही काम पर लग जाती है….. !


बिना पगार के सारे फर्ज निभानी है……

क्या बताऊ कहा से आती है माँ……….!


ये दुनिया हमेशा पैसे से मोल करती है..

तेरी नजरो में मेरे क्या मोल है मां……. ,


दुनिया ये सुनती नहीं है मेरी ………….

मेरी कीमत दुनिया को बता जा ना माँ…!


तूने हमेशा खुशियों के लिए कुर्बानी दी है

तू एक बार खुलकर मुस्कुरा ना माँ…….,


मुझे थर्मामीटर पर भरोसा होता नहीं…..

बुखार तो नहीं हाथ पकड़ कर बता ना..!


अलार्म रात मैं जब भी भर के सोता हूं….

उठकर अलार्म मैं बंद कर देता हूं……….,


मुझे कल सुबह स्कूल भी जाना है………

मुझे तू जल्दी जगा जा ना माँ…………. !


मेरे स्कूल में अध्यापक बहुत मारते हैं…..

उनको एक बार समझा दे ना माँ ………,


मुझे जल्दी जल्दी छुट्टी दे देंगे…………..

मेरे साथ स्कूल चल दे ना माँ……………!


मुझे अभी भी यू बच्चा समझती है…….

फिर भी ये क्या होता है जा रहा है……,


मेरे कपड़े छोटे होते जा रहे हैं…………

या मैं बड़ा होता जा रहा हूं माँ ………..!


मेरे कपडे बड़े संभाल के रखे है तूने….

मेरे बढती उम का हिसाब है तेरे पास….,


3 बोलता हूं रोज 4 रोटी रख देती है…..

क्या तुझे गिंनती नहीं आती है माँ……..,


बच्चे भूखे ना रह जाए रहे जाए तेरे……

खुद ठीक से नहीं खाती है माँ…………!


मेरा नसीब मैं सब अच्छा ही होगा…….

मेरे लिए तू खुदा से लड़ जाति है माँ….,


जब मैं रात को सो नहीं पाता………….

तू अपनी नींद गबाती है मां…………….!


डॉक्टर, टीचर, बने, मेरे लिए तू………

क्या क्या बन जाती है माँ…………….,


जन्म देने में मौत से लड़ जाती हैं…….,

तब जाकार हमारे देहे में प्राण लाती है.!


दुख का आलम कोई या कोई बात हो….

बिना बताए माँ सब समझ जाती है…….,


अपनी थाली का भी हिस्सा वो……..

बच्चों को बाटकर खिला देती है माँ…..!


ऐसा भी अब कौन भला कर सकता है…

माँ हो साथ जुगनू अंधकार हर सकता है,


अंधेरों का आलम है सूरज सी सुबह कर

सर्दीयों की रातो से हमें बच्चा जा ना माँ.!


बार बार पैर मारकर कंबल हटा दैता हुॅ..

माँ फिर फिर मुझे कंबल उड़ा दे ………,


बच्चे को ना लग जाए सर्दी…………..

उसकी खातिर अपनी नींद गवाती है….. !


मजबूर होकर ही मेरा दिल जुड़ा हुआ है..

पत्ता कब राजी से पेड़ से जुदा हुआ है..,


मुझको नोकरी तुझसे जुदा किया है……

तू एक बार यहां भी आ जा ना माँ……!


✍कवि दीपक सरल

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

हर रास्ते में मिलने वाले

 हर रास्ते में मिलने वाले

रास्ते के ही हो जाते हैं


दुख दर्द है हमारे मरहम

हमसे लिपट के सो जाते हैं


पंछी जब वापस आता है

सारे कोटर भर जाते हैं


रात बहुत हुई है प्यारे

अब तो हम घर जाते हैं


ऐसे थकते हैं हम यारों

ऐसे सोते मर जाते हैं


नदियों के मृदु पानी को

सागर खारा कर जाते हैं


लोग दर्द देते हैं ऐसे

जीता हारा कर जाते हैं


इतना डूबके तन्हाई में

अंदर से भी भर जाते हैं


देखा है हर मौसम हमने

क्यों यह पत्ते झड़ जाते हैं


विरानी इस दुनिया में

जंगल ही नजर आते हैं


कवि दीपक सरल

मेरी आंखों के परदे से पूछो

 मेरी आंखों के परदे से पूछो

मैंने क्या मंजर देखा है

फूलों की इस दुनिया मे

छुपा ये खंजर देखा है


मैंने मंजर देखा है ………..


कहने को तो सब अपने हैं

पूरे होते सब सपने हैं …


कश्ती किनारा कर जाता है

समय गुजारा कर जाता है

वक्त हमारा आता है जब

सबको हमारा कर जाता है


फूलों की खिलती खुशबू में

तितली , भवरे सब आते हैं

आए कभी पतझड़ मौसम

सब कुछ सूना कर जाते हैं


हमने टूटी कश्ती देखी है

मैंने मिटती हस्ती देखी है

सीधेपन से तेवर वाली

उजड़ी हुई बस्ती देखी है


मैंने हर मंजर देखा है……

जब कोई दुआ बे असर हो जाती है

 जब कोई दुआ बे असर हो जाती है

हर पुरानी मंजिल ही घर हो जाती है


जब बात हद से बढ़ जाए करीबी की

तो मोहब्बत भी बे असर हो जाती है


कवि दीपक बवेजा

8058086648

कलम दी थी मगर , हमको हुनर नहीं आया

 कलम दी थी मगर , हमको हुनर नहीं आया

रास्तों मै रहा मुसाफिर ,कभी घर नहीं आया


करीब रहा वो ,मेरा साया ,मेरा हमसफ़र बनके

जब तलक उसका मुझसे दिल भर नहीं आया


कवि दीपक बवेजा

8952008042

कौन सुनेगा चीखें मेरी

 कौन सुनेगा चीखें मेरी , कौन जख्म को भर देगा

वे घर हुआ है दिल मेरा अब, कौन इसको घर देगा


आधी चल दी दिया भुजा के ,सूरज गया क्षितिज में

कौन भुजाए प्यास किसी की कौन अब दुःख हर देगा


दीपक बवेजा सरल

घर का रास्ता आसान है मंजिल से बेहतर

 घर का रास्ता आसान है मंजिल से बेहतर

हर नया रास्ता दिखता है पुराने से बेहतर


बेज्जती ,आंसू,जिल्लत सब मिला उसको

ढूंढने चला था जब वो शख्स मुझसे बेहतर


Deepak saral

मां

एक बच्चा जो अपनी माँ से बिछड़ कर कहीं बाहर रह राहा है और वह माँ को याद करते हुए एक कविता इस प्रकार लिखता है और अपना प्यार माँ के प्रति व्यक्...