कोई किसी को कुछ न समझे कोई किसी को राह बनाये
कुछ लोगों को मिलकर लगता ये जीवन मै क्यों ही आए
हर राहें न मंजिल को जाती ,मंज़िल का हो कोई मुसाफिर
उनके घर भी रस्ते पर रह गए जो गैरों को रस्ता बतलाए
कवि दीपक सरल
एक बच्चा जो अपनी माँ से बिछड़ कर कहीं बाहर रह राहा है और वह माँ को याद करते हुए एक कविता इस प्रकार लिखता है और अपना प्यार माँ के प्रति व्यक्...
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