बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

हर रास्ते में मिलने वाले

 हर रास्ते में मिलने वाले

रास्ते के ही हो जाते हैं


दुख दर्द है हमारे मरहम

हमसे लिपट के सो जाते हैं


पंछी जब वापस आता है

सारे कोटर भर जाते हैं


रात बहुत हुई है प्यारे

अब तो हम घर जाते हैं


ऐसे थकते हैं हम यारों

ऐसे सोते मर जाते हैं


नदियों के मृदु पानी को

सागर खारा कर जाते हैं


लोग दर्द देते हैं ऐसे

जीता हारा कर जाते हैं


इतना डूबके तन्हाई में

अंदर से भी भर जाते हैं


देखा है हर मौसम हमने

क्यों यह पत्ते झड़ जाते हैं


विरानी इस दुनिया में

जंगल ही नजर आते हैं


कवि दीपक सरल

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