कभी गरीबी की गलियों से गुजरो

कभी तुम गरीब – ई की गलियों से गुजरों
फीके पड़ जाते हैं दोस्त वोस्त रिश्ते विश्ते सब !
किसी मजदूर से न पूछो दिहाड़ी कहां जाती है
बाकी रह जाते हैं कर्जे बर्जे किस्ते बिस्ते सब !!
✍कवि दीपक सरल
एक बच्चा जो अपनी माँ से बिछड़ कर कहीं बाहर रह राहा है और वह माँ को याद करते हुए एक कविता इस प्रकार लिखता है और अपना प्यार माँ के प्रति व्यक्...
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