बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

कलम दी थी मगर , हमको हुनर नहीं आया

 कलम दी थी मगर , हमको हुनर नहीं आया

रास्तों मै रहा मुसाफिर ,कभी घर नहीं आया


करीब रहा वो ,मेरा साया ,मेरा हमसफ़र बनके

जब तलक उसका मुझसे दिल भर नहीं आया


कवि दीपक बवेजा

8952008042

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

मां

एक बच्चा जो अपनी माँ से बिछड़ कर कहीं बाहर रह राहा है और वह माँ को याद करते हुए एक कविता इस प्रकार लिखता है और अपना प्यार माँ के प्रति व्यक्...